Wednesday, 30 November 2016

तुम ठहर क्यों नही जाते

तुम ठहर क्यों नहीं जाते।
एक रात तुम बदल क्यों नहीं जाते।।

सुनने की मजबूरी है,
लेकिन शायद कुछ करना भी जरुरी है।
तुम कभी वो सब कह क्यों नहीं जाते,
एक शाम तुम मिल क्यों नहीं पाते।

सच का वास्ता था उम्मीदों की दहलीज़ पर,
तुम्हारा ही अक़्स था उस मुर्दा तस्वीर में।
तुम जीवन क्यों नहीं बन जाते,
एक दुपहरी तुम सो क्यों नही जाते।

रवायतें समाज की थी तकलीफ लेकिन तुमको थी,
जिंदगी से हार जाने की एक खीझ तुममें थी।
तुम क्यों नहीं सब कुछ सुन लेते,
एक जिंदगी क्यों तुम मेरे नाम नही कर जाते।

Sunday, 25 September 2016

क्योंकि मै उम्मीद नही रखती



मै तो लेकर चलना चाहती थी तुमको साथ
लेकिन तुम तो पड़े हो उन्ही रवायतों में
अनसुने विचार प्रकट हो गए थे
लेकिन तुम्हारी हकीकत अभी भी नहीं
अब मै इस समाज से कोई भी चाहत नही करती
क्योंकि वो क्या है न मैं उम्मीद नहीं रखती।

गलत नहीं हो तुम शायद...लेकिन गलत मैं भी तो नहीं
जिंदगी में बस एक तुम्हारी ही कमी तो नहीं
मै सोच के हैरान हूँ कि तुम साधारण ही निकले
सोच थी दुनिया बदलने की और तुम पीछे ही निकले
इसलिए शायद अब मै कोई उम्मीद नहीं रखती

शायद इस बंधन को तुम बंधन समझो....
और क्या बंधन ही है ये...तुम्हारी सोच का बंधन
क्यों मुक्त नही....क्यों उन्ही झंझटों में हो
मै तो दो पल ठहर कर तुम्हे सहारा दे भी दूँ
लेकिन वो क्या है न मैं उम्मीद नहीं रखती

मौसम से नज़ारे एक तरफ तुमसे किनारे एकतरफ
तुम जो तुम हो....शायद वो तुम हो ही नही
परदे के पीछे कुछ और ही था...
और जो मैं देखती रही वो था एक छदम्
मैं तो अब सम्भाल लूँ अपने को
लेकिन तुम्हारा सोच के अब परेशान नहीं होती
क्योंकि मैं अब कोई उम्मीद नहीं रखती...

Sunday, 28 August 2016

कोई खास फ़र्क़ नही आएगा

ये घटायें घनघोर सी छायी हैं
तेरे दिल को क्या मेरी कुछ याद आयी है..
आरजू तुम्हारी सदियों से थी हमको
तुमको क्या कुछ ऐसी उम्मीद नज़र आई है

संग तुम्हारे जो बिता था पल
एक कहानी बन के रग रग में है बस गया
कुछ उम्मीदों की कड़ियाँ थी
और कुछ सपनो की घड़ियाँ थीं

विचित्र स्तिथि में अब हैं हम
क्या तुमको कुछ कहना भी है
इसके आगे क्या तुमको और भी कही तक जाना है
हाँ कह कर तुम सफल मेरा जीवन कर दोगे
न भी कह दोगे तो कोई खास फ़र्क़ न आएगा

Sunday, 5 June 2016

मैं तुम और मेरा लखनऊ

तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है....अंधेरो को भी मिल गयी रौशनी है"...
तुम्हे याद है ये मेरा पसंदीदा गाना हुआ करता था.....आज भी तुम्हारा नाम जब सुनती हूँ...पता नही क्या टूट जाता है अंदर.... टूटे हुए टुकड़ो को समेटना चाहती हूँ....कि जिंदगी फिर से पटरी पर आ जाये..... ये टूटन अंदर भी है और बाहर भी.... लाल पुल पर से जब भी गुज़रती हूँ तो तुम्हारी बात याद आ जाती है...एक दिन इस तरह का लाल रंग तुम्हारे माथे पर होगा.... पर तुम्हे पता है...लाल पुल धीरे धीरे ढल रहा है...मतलब उसका लाल रंग क्षीण हो रहा है..... तुम्हारे हाथों में हाथ डाले.... रूमी गेट से इमामबाड़ा.... वहाँ से क्रिस्टियन कॉलेज...वहाँ से हज़रत गंज....सब टहलते रहते थे....अब सोचते हैं कि जिंदगी वहीँ थमी रहती तो कितना बेहतर होता..... सुनो वो बेंच याद है न.... जिसपर घण्टों बैठे रहते थे.... पता है अब वहाँ उस तरह की और बेंचेस् लग गयीं हैं..... पर मैं रोज गुज़रते हुए तुम्हे ही खोजती रहती हूँ....क्या पता एक नज़र तुम मिल ही जाओ..... तुम ..क्या तुम भी मुझे याद करते हो....? मेरे बालों में उंगलियां घुमाते हुए आँखों में आँखे डालते थे तो तुम्हारी आँखों में ये जो सौम्यता थी न बस यही मुझे अपार शांति और ख़ुशी देती थी.... तुमको पहले ये हमारा लखनऊ नहीं पसंद था...कहते थे क्या है ऐसा इस शहर में...
 लेकिन बाद में तुमको लखनऊ से मोहब्बत पहले...हमसे बाद में हुई.... हम तुमको कहते थे न ...हमारा शहर तुमको अपना बना ही लेगा.....  ये जो रूमी दरवाजे से जो शाम की धूप सीधे तुम्हारे चेहरे पर पड़ती थी न.... बस यही हाँ बस यही मेरे लखनऊ की शामे थी...शाम-ए-अवध के सबके अपने किस्से हैं....मेरा ये हैं...मेरा तो हर किस्सा तुम पर शुरू तुम पर ही खत्म हो जाता है.... तुमसे ये लगाव इतना अपार प्रेम कब हो गया इन चौक की गलियों में घूमते घूमते कुछ पता ही न चला....... ये मेरा अंजुमन था मेरा लखनऊ...जहाँ हमारी दुनियां ने एक खूबसूरत मोड़ लिया था....तुम मुझे मेरी दुनिया से दूर USA ले जाना चाहते थे..... तुम मुझे स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी दिखाना चाहते थे..... और अमरीका की सैर कराना चाहते थे...मैं तैयार भी थी लेकिन वहीँ हमेशा बस जाने की शर्त पर नही.... हमारे लिए तो लखनऊ विश्वविद्यालय किसी भी ऐतिहासिक इमारत से जादा प्रिय है....ऐसा नही है कि मै लखनऊ नही छोड़ती तुम्हारे लिए....तुम्हारे लिए तो मै दुनिया कि हर चीज से बगावत क्र देती....सब से लड़ जाती....बस लेकिन तुमसे ही न लड़ पायी तुम्हारे लिए.... खैर आज तुम्हारी शादी की पहली सालगिरह मुबारक हो....सुना है....दिल्ली आये हो...छप्पन भोग का पार्सल भेज रही हूँ...स्वीकार कर लेना.....

तुम्हारी लखनऊ वाली एक दोस्त....

Sunday, 7 February 2016

अपरिचित प्रेम

मै समझ रही हूँ
हाँ हाँ मै समझ रही हूँ
तुम्हारी ये कशिश तुम्हारी ये पीड़ा

तुम्हारी आत्मग्लानि को शायद नहीं समझ पा रही हूँ...
उम्मीद खो दी है तुमने
हाँ उम्मीद ...व्ही उम्मीद जो तुम मुझे दिखाते थे
वही उम्मीद जिसके सहारे हम मीलों का लंबा सफ़र तय कर लेते थे...
अब क्यों बोझिल हो रहे हैं तुम्हारे पाँव
चमक क्यों नहीं रही हैं तम्हारी आँखे
प्रेम क्यों नही नज़र आ रहा मुझे इनमे
तुम थक गए हो....हाँ सचमुच थक गए हो...
लेकिन इतनी जल्दी...ऐसा कैसे हो सकता है कैसे

फिर से अपरिचित हो जाना चाहते हो.....
अपरिपक्व कह रहे हमारे प्रेम को...
कहा था मैंने पहले ही आसान नही होगा...
समझ मै तब भी रही थी
समझ मै आज भी रही हूँ तुम्हे
तुमने कहा था तुम निभा लोगे प्रेम
तुम इस प्रेम शब्द को संभाल लोगे
तो क्यों आज पीछे हट गये

सुनो जा रहे हो तो जाओ...
लेकिन फिर अब कभी किसी को कोई वचन न देना....
जिसका तुम निर्वाह न कर सको...

Sunday, 20 December 2015

वो हिम्मती लड़की

वो लड़की जो कुछ डरी सहमी सी रहती थी.. हिम्मती नही थी....उसकी दुनिया दूसरों के इशारों पर सीमित थी.......जो कभी किसी को पलट कर जवाब नही देती थी....जो सबका कहना मानती थी....जिसके क्लास में फर्स्ट आने की बात पर भी घरवाले कान नहीं देते थे...जो  चश्मा लगाती थी तो लड़के उसको बैटरी कह के चिढ़ाते थे....किताबी कीड़ा कह के मजाक बनाते थे....जो लड़की पापा के घर आने पर तुरंत उनका खाना लगाने चल देती थी....जिसको उसका छोटा भाई भी मार के चला जाता था.....जिसका पसंदीदा गाना था "आज मै ऊपर आसमा नीचे" लेकिन वो कभी गाती नही थी..लेकिन वो लड़की कमरा बंद करके बेड पर कूद कूद के डांस करती थी

आज वो लड़की किसी बड़े शहर के एक घर के किचन में अपने हस्बैंड के लिए पराठे बना रही होगी...पूछ रही होगी और लेंगे क्या....या  अपने बच्चों के पेरेंट्स मीटिंग में बैठी होगी....शायद फिर किसी जॉब का इंटरव्यू देने जा रही होगी.....या MBA एंट्रेंस की तैयारी कर रही होगी.... या किसी कमरे में अकेले बैठी देख रही होगी अपने सुनहरे भविष्य के सपने......या होगी किसी बस में एक लड़के को चाटा मारते हुए...(किसी लड़की को छेड़ने के लिए) या होगी किसी दूकान पर  दस रूपये के लिए लड़ाई करती हुई....

उसको याद आता है कि वो उन बैटरी कहने वाले लड़को को जवाब देना चाहती थी....कि हाँ मै चश्मा लगाती हूँ क्योंकि मेरी नज़र कमजोर है  तो इससे तम्हे क्या....वो चीख चीख कर कहना चाहती थी...देखो मै फर्स्ट आई हूँ......
वो बहुत कुछ कहना चाहती थी उन रिश्तेदारों को जो उसकी higher studies के खिलाफ थे.........वो बहुत कुछ कहना चाहती थी उनलोगों से जो उसकी शादी 20 साल में ही कराना चाहते थे.....वो कहना चाहती थी जो बिटिया बड़ी हो गयी है इतनी छूट मत दो  ये कहने घर आ जाते थे......वो कहना चाहती थी उन लड़के वालों को की तम्हारे बेटे के बराबर ही मैं पढ़ी हूँ तो दहेज़ क्यों.....
वो जो लड़की हिम्मती नही थी .....वो रोज निकलती हैं इस समाज में अपनी खोयी हुई हिम्मत तलाशने...और एक बोल्ड लड़की बनने को...जिसको कोई दबा न सके..जो किसी की गलत बात सुन के जवाब देने का हौसला  रखती हो

Thursday, 3 December 2015

तुम और हम


मिथ्या कहते हो मेरे वचनों को
कोई अघोषित सी बात समझते हो
तुम जो तुम हो तो क्या कोई दिखावा है
या उससे परे भी कुछ कहते हो....

जैसे तुमने थी वो बात कही 
वो तुम्हारी अभिलाषा थी
तुम्हारे उन कृत्यों से उद्वेलित
विरक्ति में आसक्ति की इक आशा थी....

अकिंचित दुःख था मेरा और तुम्हारा
क्योंकर थी  तुमने वो चेष्टा की
आज भरे बादल के सम्मुख
जिज्ञासा को जैसे स्वर मिला.......