Tuesday, 31 March 2015

तुम व्यर्थ निमग्न रहते हो

कभी चंचल होते हो कभी सरस सहज रहते हो
भावों को अपने तुम कठिन हुआ कहते हो
तुम बिन जीवन आज मेरा कोरा कागज़ सा लगता है
अब स्वप्न में तुम ही तुम तो बसते हो
मेरे जीवन की इस बगिया में एक तुम ही तो अब सजते हो

तुम साथ नही तुम पास नही 
तुमसे राग नही तुमसे द्रेष नही
तुम अपनी राहो में ही जाते हो
कुछ नयी कहानी सुनाते हो
तुम एक जगह न स्थिर हो

मेरे प्राणों की लेकिन तुम परिभाषा हो
तुम ही मेरे नैनों की भाषा हो
तुम चिंतन के अभिलाषी हो
तुम विचलित सी गंगा हो
तुम आज मेरी न समझते हो
तुम व्यर्थ निमग्न रहते हो

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