Thursday, 3 December 2015

तुम और हम


मिथ्या कहते हो मेरे वचनों को
कोई अघोषित सी बात समझते हो
तुम जो तुम हो तो क्या कोई दिखावा है
या उससे परे भी कुछ कहते हो....

जैसे तुमने थी वो बात कही 
वो तुम्हारी अभिलाषा थी
तुम्हारे उन कृत्यों से उद्वेलित
विरक्ति में आसक्ति की इक आशा थी....

अकिंचित दुःख था मेरा और तुम्हारा
क्योंकर थी  तुमने वो चेष्टा की
आज भरे बादल के सम्मुख
जिज्ञासा को जैसे स्वर मिला.......


2 comments:

  1. bhare badal k sammukh ,jigyasa ko ek swar mila .... kya bolun , bht achhe se to ni smjh aaya bt jitna smjh paaya vo shayad ek bht badi feeling ko words k form me bht sundarata se likha gya h

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