Sunday, 7 February 2016

अपरिचित प्रेम

मै समझ रही हूँ
हाँ हाँ मै समझ रही हूँ
तुम्हारी ये कशिश तुम्हारी ये पीड़ा

तुम्हारी आत्मग्लानि को शायद नहीं समझ पा रही हूँ...
उम्मीद खो दी है तुमने
हाँ उम्मीद ...व्ही उम्मीद जो तुम मुझे दिखाते थे
वही उम्मीद जिसके सहारे हम मीलों का लंबा सफ़र तय कर लेते थे...
अब क्यों बोझिल हो रहे हैं तुम्हारे पाँव
चमक क्यों नहीं रही हैं तम्हारी आँखे
प्रेम क्यों नही नज़र आ रहा मुझे इनमे
तुम थक गए हो....हाँ सचमुच थक गए हो...
लेकिन इतनी जल्दी...ऐसा कैसे हो सकता है कैसे

फिर से अपरिचित हो जाना चाहते हो.....
अपरिपक्व कह रहे हमारे प्रेम को...
कहा था मैंने पहले ही आसान नही होगा...
समझ मै तब भी रही थी
समझ मै आज भी रही हूँ तुम्हे
तुमने कहा था तुम निभा लोगे प्रेम
तुम इस प्रेम शब्द को संभाल लोगे
तो क्यों आज पीछे हट गये

सुनो जा रहे हो तो जाओ...
लेकिन फिर अब कभी किसी को कोई वचन न देना....
जिसका तुम निर्वाह न कर सको...

1 comment:

  1. Bht muskil hota hai jaana...juhi g..aur nibhana bhi..so aapki baat bhi sahi hai...ab aur kisi ko wachan na dena..fav line..

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